गेहूँ की खेती: 80 क्विंटल पैदावार के लिए अपनाएं यह चमत्कारी फॉर्मूला
गेहूँ की फसल जब 50 से 80 दिन के बीच की होती है, तो यह समय पैदावार के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस अवस्था में फसल या तो गबोट (बालियां निकलने की स्थिति) में होती है या दूसरी-तीसरी सिंचाई पर। अधिक पैदावार और लंबी बालियों के लिए सही खाद और उर्वरकों का प्रयोग अनिवार्य है। यदि आपकी फसल में पीलापन दिख रहा है, तो 1 किलो यूरिया, आधा किलो जिंक (33%), 1 किलो मैग्नीशियम सल्फेट, आधा किलो मैंगनीज सल्फेट और आधा किलो फेरस सल्फेट का घोल बनाकर 180-200 लीटर पानी में स्प्रे करें। यह फोलियर स्प्रे मिट्टी के माध्यम से दिए गए खाद की तुलना में अधिक प्रभावी होता है और क्लोरोफिल बढ़ाकर पीलापन दूर करता है।
जिन किसानों ने अधिक ऊंचाई वाली किस्में जैसे DBW 303, DBW 187 या WS 1270 लगाई हैं, उनके लिए फसल की हाइट को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है। अत्यधिक लंबाई के कारण बालियों के वजन से फसल गिर सकती है, जिससे पैदावार में 30-40% की कमी आ सकती है। इसके बचाव के लिए जब गेहूँ 50-55 दिन का हो और उसमें पहली गांठ बन रही हो, तब लियोसिन (PGR) का 2 ml प्रति लीटर पानी के हिसाब से स्प्रे करें। भारी मिट्टी वाले खेतों में इसके साथ टेबुकोनाजोल (1 ml/L) भी मिलाया जा सकता है, जो फसल को मजबूती प्रदान करता है और उसे गिरने से बचाता है।
जब फसल गबोट अवस्था में हो और बालियां निकलने ही वाली हों, तब कैल्शियम नाइट्रेट का प्रयोग एक ‘मैजिक’ की तरह काम करता है। प्रति एकड़ 10 से 15 किलो कैल्शियम नाइट्रेट के साथ 15-20 किलो यूरिया मिलाकर डालने से पौधे का तना मजबूत होता है और नाइट्रोजन की कमी पूरी होती है। इसके साथ ही ऊपर से NPK 0:52:34 का स्प्रे करना चाहिए। इसमें मौजूद 52% फास्फोरस और 34% पोटाश बालियों की लंबाई बढ़ाते हैं, दानों का भराव ऊपर तक करते हैं और दानों को चमकीला व वजनदार बनाते हैं।
अंत में, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पोटाश न केवल दानों की गुणवत्ता सुधारता है, बल्कि फसल को मौसम के तनाव, जैसे अचानक बढ़ती गर्मी या पाले से भी बचाता है। यदि इन वैज्ञानिक तरीकों और उर्वरकों का सही समय पर छिड़काव किया जाए, तो गेहूँ की पैदावार 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। किसान भाई अपनी फसल की स्थिति के अनुसार इन सुझावों को अपनाकर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।