उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी का अकाल: क्यों पड़ रही है सूखी और अजीब सर्दी, जानें फसलों और पर्यटन पर इसका असर.
उत्तर भारत में इस बार सर्दी का मिजाज सामान्य से काफी अलग और चिंताजनक बना हुआ है। दिसंबर का महीना पिछले 25 वर्षों में सबसे शुष्क (Dry) रहा है, जिसमें बारिश की कमी लगभग 69% दर्ज की गई है। पहाड़ों पर भी स्थिति काफी खराब है; उत्तराखंड में 100% और हिमाचल प्रदेश में 99% बारिश की कमी है। जम्मू-कश्मीर के ‘चिल्लाई कलां’ (कड़ाके की ठंड का समय) के दौरान भी गुलमर्ग, पहलगाम और शिमला जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों पर वैसी बर्फबारी नहीं हुई है जैसी आमतौर पर होती है।
इस बार की सर्दी ‘अजीब’ इसलिए है क्योंकि उत्तर भारत में ‘कोल्ड वेव’ (शीतलहर) से ज्यादा ‘कोल्ड डे’ (ठंडा दिन) का असर दिख रहा है। कोहरे की घनी परत जमीन से कुछ ऊपर होने के कारण सूरज की रोशनी धरती तक नहीं पहुंच पा रही है, जिससे दिन का तापमान सामान्य से 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर गया है। हालांकि, रात का तापमान अभी भी सामान्य के करीब है। वर्तमान में सर्दी का सबसे ज्यादा प्रकोप उत्तर प्रदेश के इटावा, बिहार के पटना और छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जैसे इलाकों में है, जहां तापमान 3 से 4 डिग्री तक पहुंच गया है।
बारिश और बर्फबारी न होने का सीधा असर कृषि, बागवानी और जल स्रोतों पर पड़ रहा है। रबी की फसलों के लिए यह सूखा मौसम और ‘पाला’ (Frost) नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसके अलावा, बर्फबारी की कमी के कारण पहाड़ों पर पर्यटन उद्योग प्रभावित हो रहा है और साथ ही ग्लेशियरों के पुनर्भरण (Replenishment) में भी बाधा आ रही है, जो भविष्य में जल संकट का कारण बन सकता है। दिल्ली जैसे शहरों में भी पिछले 90 दिनों से अधिक समय से कोई महत्वपूर्ण बारिश दर्ज नहीं की गई है।
मौसम के पूर्वानुमान की बात करें तो अगले 10 दिनों तक किसी सक्रिय ‘वेस्टर्न डिस्टरबेंस’ (पश्चिमी विक्षोभ) की संभावना नहीं दिख रही है। इसका मतलब है कि 15-16 जनवरी तक उत्तर और मध्य भारत में इसी तरह की शुष्क और ठंडी स्थिति बनी रहेगी। हालांकि, 20 जनवरी के आसपास एक नया सिस्टम बनने की उम्मीद है, जिससे पहाड़ों पर बर्फबारी और मैदानी इलाकों में बारिश होने की संभावना हो सकती है। तब तक किसानों को सिंचाई के लिए अपने कृत्रिम संसाधनों पर ही निर्भर रहना होगा।